भाषा हमें एक पहचान देती है . शासक वर्ग हमेशा आम जन की भाषा से भिन्न भाषा का प्रयोग करता है .यह उसे विशिष्टता और सुरक्षा प्रदान करती है .उनके बुद्धिजीवी भी उसी भाषा में बात करते हैं . बुद्धिजीवी अगर आम जन की भाषा बोलने लगें तो उनकी विशिष्टता बहुत हद तक स्वतः समाप्त मानी जायेगी . इसकी जड़ें औपनिवेशिक दासता से उत्पन्न मानसिकता में भी है . कई राजनीतिक पार्टियां भी , जो आम जन की मुक्ति की बात करती हैं ,भाषा के मामले में अंग्रेजी से चिपकी हैं . कारण शायद यह हो कि उनका नेतृत्व भी उच्च मध्य वर्ग के हाथों में है . आंदोलनों और पार्टियों के नेता जब किसानों -मजदूरों के बीच से आएंगे तभी शायद यह सवाल हाल हो . अकादमिक जगत में भी हमें वैसे बुद्धिजीविओं की फ़ौज के आगमन का इंतजार है जो कह सकें कि मेरे दादा हलवाहे थे . देश के स्तर पर एक तरह के स्कूल और सिलेबस की गारंटी भी इस समस्या को हल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल हो सकती है .
Thursday, December 23, 2010
आप बहुत सही सवाल उठा रहे हैं . एक वर्ग -विभाजित समाज में भाषाओँ की भी सामाजिक हैसियत होती है . अंग्रेजी सांस्कृतिक श्रेष्ठों की भाषा है और हिंदी कमतरों की .
Monday, November 22, 2010
आप सही कह रहे हैं .लेखन सायास ही होता है लेकिन उसमे बहुत कुछ अनायास भी शामिल होता चलता है . निराला अपने समय की उपज थे इसलिए समय की अच्छाइयां और गडबडियां भी साथ थीं . और ये उस युग की विशेषता है अकेले निराला की नहीं . इतिहास में समय की मांग शामिल रहती है ,इसलिए बदले हुए समय में बहुत सी बातें अनावश्यक हो जाती हैं . निराला इसके अपवाद नहीं हो सकते . आज हम सभी एक बदले हुए समय मैं हैं इसलिए हमारी जरूरतें भी भिन्न हैं . हमें इतिहास की पुनर्रचना करनी होगी ,ऐसा हो भी रहा है .यह भी सही है कि इतिहास में कभी एक धारा नहीं रही है . मोटे तौर पर दो ताकतें हैं -प्रगतिशील और प्रगति विरोधी . इस पहली ताकत के लोगों को संगठित होकर काम करना होगा. लेकिन यहाँ भी कुछ सैद्धांतिक मतभेद हैं जो रहेंगे क्योंकि उनके भिन्न वर्गीय हित हैं . यह स्वाभाविक है .
Sunday, November 21, 2010
निराला की कविताओं में इन बातों के होने से कोई इंकार नहीं कर सकता लेकिन समग्रता में वे हिंदी कविता को आगे ले जानेवाले कवि हैं. भारत में राष्ट्रीयता का विकास ही हिंदू एवं मुस्लिम राष्ट्रीयता (आप उसे पुनरुत्थानवाद कहें ) के रूप में हुआ. कविता... ही नहीं, इतिहास लेखन के क्षेत्र में भी ऐसी ही प्रवृत्ति देखी जा रही थी. प्रख्यात इतिहासकार के. पी. जायसवाल भी 'हिंदू पोलिटी ' में साफ -साफ दिखा रहे थे कि भारत प्रजातंत्र का आदि- स्थल रहा है .इस तरह का 'अविवेक' शायद साम्राज्यवाद की इस प्रस्थापना की प्रतिक्रिया में पैदा हो रहा था कि 'भारतीयों का अपना कोई इतिहास नहीं है'. इस विशेष ऐतिहासिक परिस्थिति में भारतीय राष्ट्रवाद का यह स्वरुप भी कुल मिलकर प्रगतिशील ही माना जायेगा,बल्कि माना ही जाता है .इसे साम्राज्यवाद का दबाव मानना चाहिए. ध्यान रखने की बात है कि अपनी राष्ट्रीयता अंग्रेजी साम्राज्यवाद की प्रतिक्रिया में पैदा हुआ, स्वाभाविक विकास नहीं था यह. और यह प्रतिक्रिया नेहरु तक में मिलती है. उनके लिए भी भारतीय इतिहास में गुप्त काल का उत्थान 'राष्ट्रीयता ' का उत्थान है.
छायावादी कवियों में समाजवाद का का सीधे -सीधे नाम लेकर सबसे ज्यादा कविताएं संभवतः पंत द्वारा लिखी गईं लेकिन हिंदी पाठकों के विवेक ने उन्हें वह गौरव नहीं दिया जो निराला को है. अगर यह सब इतिहास की भूल है तो आप उसका निश्यय ही सुधार करें. इतिहास के इस फैसले का आप क्या करेंगे कि कोई मिथकों पर लिखकर बड़ा कवि हो जा रहा और कोई समाजवाद पर लिखकर भी कमतर ही रह गया ?See more
Saturday, November 20, 2010
राम की शक्तिपूजा के बहाने
भाई 'राम की शक्तिपूजा' का नवल जी का अध्ययन संस्कृत ज्ञान के अभाव में कितना प्रामाणिक है , मैं नहीं कह सकता .
राम -कथा पर कविता लिखकर तुलसीदास आज भी हिंदी के सबसे बड़े कवि हैं .उन्होंने परंपरा से जितना लिया है निराला बेचारे क्या ले पाएंगे. परंपरा का ज्ञान अथवा पूर्ववर्ती ज्ञान का उपयोग चोरी है , मुझे समझ में नहीं आता. मिथकों की व्याख्या करके कोई प्रगतिशील कहलाये और कोई प्रगति विरोधी -यह उचित नहीं .राम की शक्तिपूजा और सरोज -स्मृति में चुनाव का भी सवाल नहीं है .इनमें से एक को छोड़कर दूसरे को समझा भी नहीं जा सकता शायद . शायद इसलिए कि राम की शक्तिपूजा पर बोलने का मैं उचित ही अपने को लायक नहीं मानता .चूँकि एक पाठक के बतौर मैं इस कविता को पढ़ता रहा हूँ इसलिए निवेदन कर सकता हूँ कि यह राम -रावण युद्ध का वर्णन न होकर निराला के खुद कि समरगाथ है .सरोज स्मृति को भी मैं इसी सन्दर्भ में पढ़ता हूँ .इन दोनों के कथा -सूत्र मुझे एकमेव लगते हैं . राम की शक्तिपूजा में मुझे इतना आवेग मिलता है कि इसकी कृत्रिमता के बारे में सोंच भी नहीं पाता .
हाँ मुसाफिर भाई , मुझे जहां गलती लगती है वहां मैं खुले मन से स्वीकार करता हूँ -जैसा आपने मेरी ही पंक्तियों को उद्धृत कर दिखाया भी है लेकिन राम की शक्तिपूजा को एक बड़ी कविता कहने से अब भी इंकार नहीं कर सकता . प्रगतिशीलता मेरे लिए मात्र फैशन न...हीं है एक स्थायी जीवन मूल्य है . लेकिन जबतक मुझे खुद को किसी बात का इत्मीनान नहीं हो जाता , स्वीकार करने की गलती नहीं कर पाता .मैं फिर अपनी सीमा का उल्लेख करते करते कहूँ कि राम की शक्तिपूजा पर निष्कर्ष रूप में कहने लायक नहीं हुआ हूँ . आस्वाद के स्तर पर यह कविता मुझे अब भी बड़ी लगती है .
भाषा में सवर्ण और दलित मानसिकता का मैं विरोधी हूँ और इसे गाली के रूप में स्वीकार करता हूँ .वर्गीय राजनीति का हिमायती रहा हूँ जिसका मुझे गर्व है .हाँ मैं इसे फिर से संस्कृत की तैयारी के साथ पढ़ने की योजना में हूँ और सदिच्छा है कि आपके विचारों के निकट पहुँच सकूँ .
तुलसीदास की छवि सिर्फ रामचरितमानस को आधार बनाकर नहीं गढ़ी जा सकती .कवितावली में तो वे कई आधुनिक प्रगतिशीलों के भी नाक -कान काटते है.ख़म ठोकनेवाले त्रिलोचन को भी तुलसीदास के यहाँ बहुत कुछ सीखने को मिला है .अशोक भाई , मेडिकल सायंस के कुछ अंधविश्वासों का रहस्य खोलें तो समझा जा सके .
Friday, November 19, 2010
साहित्य में इस तरह के विभाजन से एकदम इंकार नहीं किया जा सकता . दलित साहित्य का तो आधार वाक्य है कि अबतक का साहित्य सवर्ण साहित्य है .भारतीय समाज में जाति एक प्रभावी पहचान है .कुछ स्तर पर प्रगतिशील लेखक भी इस आधार पर अघोषित रूप में संगठित है....मेरे शहर पटना में कुछ प्रगतिशील साहित्यकार अपने कमरे के एकांत में जब आपसे बात करेंगे तो वे जाति के उच्चासन पर ही बैठकर. यहाँ हमारा फेसबुक भी उसका शिकार है .एक दिन मैंने पाया कि एक राजपूत मित्र के स्टेटस पर दुनिया भर के राजपूत पधार गए . हाँ इसके समानांतर वैसे लेखकों -पाठकों का भी एक वर्ग है जो आधुनिक मूल्यों के प्रति कटिबद्ध हैं . · 2 peopleLoading...
इतिहास लेखन की कई धाराएँ साथ -साथ चलती हैं . सब को सत्ता के खेल का हिस्सा नहीं बताया जा सकता . मजे की बात है 'दोबारा ' लिखे गये इतिहास का भी पुनर्लेखन होता है .प्रत्येक पीढ़ी अपने समय का इतिहास अपने तरीके और वक्त की मांग के हिसाब से लिखती है . इन्हीं अर्थों में 'इतिहास का अंत' नहीं होता या कहें कि 'अंतिम इतिहास' जैसी चीज नहीं होती .
Monday, November 15, 2010
Raju Ranjan Prasad माँ,बहन भाई या ब्राह्मण कोई भी आपके हाथ पर धागा बांधे वह केवल और केवल अंधविश्वास का धागा है . एक वैज्ञानिक ,तार्किक मन ऐसा किये जाने का विरोध करेगा .
42 minutes ago · · 4 peopleLoading...
Singh Umrao Jatav
@pratyush ji, बात इंसान के अपराधी होने की नहीं है। बात है अंधी धर्मभीरुता की। आपने शायद एक बात को नज़र अंदाज़ कर दिया की वे डाक्टर महोदय उस सिपाही पुजारी के पाँव छूते थे जो सेना में सबसे निचले दर्जे का कर्मचारी था। सेनाओं में अनुशासन बनाए र...खने के लिए ये सबसे बड़ा गुनाह है। यह कैसी धर्मभीरुता है की प्राणप्रिय पत्नी की हत्या को भूल कर व्यक्ति फिरसे उन्हीं चरणों में झुक जाए। क्या बिना चरणों में झुके भक्ति नहीं हो सकती। दिल्ली में जिस कालोनी में मैं रहता हूँ मेरे नीचेवाले ग्राउंड फ्लोर फ्लैट के सज्जन बहुत सज्जन हैं । दो बेटियाँ हैं, दोनों ही एमबीबीएस,एमडी हैं। डाक्टर एक वैज्ञानिक होता है जो शरीर और जीवन की सच्चाई को वैज्ञानिक दृष्टि से जानता है। हर शनिवार को एक गंदा सा आदमी -" शनि महाराज..." की टेर लगता कालोनी में घूमता है। लो, आवाज़ सुनते ही वैज्ञानिक डाक्टर बेटी दौड़ती हुई दरवाजे पर आती है उसके तेलवाले बर्तन में पैसे डालने। कई बार यदि या तो पुकार सुन न पाई हो अथवा बाथ रूम वगैरा: में हो तो उसे तलाश करती हुई कालोनी में भागी फिरती है। और कोई उस परिवार से उस शनि महाराज वाले आदमी को घास नहीं डालता है। इसे क्या कहेंगे आप?
Singh Umrao Jatav
दिलीप मण्डल जी, किन वाहियात लोगों के बारे में बात पूछी है। मैंने लंबे 36 वर्ष सशस्त्र सेना में अधिकारी के रूप में नौकरी की है। बहुत से लोगों को शायद न मालूम हो,लेकिन हमारे इस तथाकथित धर्मनिरपेक्ष देश में सशस्त्र सेनाओं में प्रति रविवार और स...ारे ही हिन्दू त्योहारों पर मंदिर में जाना अनिवार्य है। यदि यूनिट में मंदिर के अलावा मस्जिद,गुरद्वारा ,चर्च इत्यादि हैं तो वे वहाँ जाते है।जो नास्तिक हैं उन्हें कोई छूट नहीं है। सो कितनी ही बार तो मुसलमान अधिकारी को भी पुजारी से ये वाहियात लाल धागा बँधवाना पड़ जाता है। लेकिन में पूरे 36 वर्ष अड़ा रहा और न मंदिर गया, न धागा बँधवाया। नतीजा यह हुआ कि मुझ से जवाब तलब किया गया,धमकियाँ दी गईं। अंतत: मुझे भी अपने सीनियर को संविधान का हवाला देकर बताना पड़ा कि यदि मुझे मजबूर किया जाएगा तो मैं उनके खिलाफ कोर्ट में चला जाऊंगा। संदर्भवश इस लाल धागे को धर्मभीरु हिन्दू किस हद तक लेते हैं इससे संबंधित एक घटना। मेरी पोस्टिंग तब मिज़ोरम में थी। सहायक कमांडेंट के पद के एक उड़िया डाक्टर उस यूनिट में थे। वो और उनकी पत्नी हद दर्जे के धरभीरू थे। आर्मड फोरसेज में मंदिर का पुजारी उसी यूनिट का कोई सिपाही इत्यादि होता है ( आर्मी में वो सूबेदार होता है) सो ये डाक्टर और उनकी पत्नी अपने बच्चों समेत सबसे निचले रैंक के उस सिपाही पुजारी के सुबह उठते ही पैर छूते थे। किस्सा लंबा है लेकिन, खैर उस सिपाही पुजारी ने एक दिन जब ये डाक्टर एक दिन के लिए मुख्यालय से दौरे पर बाहर गए थे रात में उनकी पत्नी पर बलात्कार करके गला घोंट कर हत्या कर दी। पुजारी को अरेस्ट करके केस चला। यूनिट कि बदनामी हुई। मैंने तो सोचा यह था कि डाक्टर का अब पुजारी-पूजा पाठ से मोहभंग हो गया होगा। लेकिन उस पुजारी के अरेस्ट हो जाने पर दूसरा कोई सिपाही पुजारी नियुक्त होना ही था। तथाकथित भगवान को अकेला छोड़ा जाना संभव ही नहीं था!!! सो दूसरा सिपाही पुजारी नियुक्त हुआ और डाक्टर उस अगले पुजारी के पैर छूने लगे-गंडे बँधवाने लगे। लानत है,भईSee more
जाति व्यवस्था एक सामाजिक -सांस्कृतिक बुराई है . इसे निर्मूल करने की लड़ाई में मैं भी अपने को शरीक मानता -कहता हूँ . आपका सुझाव स्वागत योग्य है . लोग छोटे स्तर पर ही सही, इस दिशा में अग्रसर भी हैं,अलबत्ता सरकार इसे प्रोत्साहित नहीं कर रही . ल...ेकिन यह अंतर्जातीय विवाह(अनुलोम -प्रतिलोम दोनों ही ) काफी नहीं है .मेरा अनुभव कहता है कि लोग ऐसी शादियाँ करके भी जाति से ऊपर नहीं उठ पाते .हाँ कुछ अपवाद अवश्य हैं .जाति व्यवस्था को निर्मूल करने का एकमात्र तरीका वर्ग चेतना को समृद्ध करते हुए वर्ग संघर्ष को तेज करना होगा .बाकी ये सारे तरीके सहयोगी उपाय हैं , एकमात्र नहीं .
Sunday, November 14, 2010
- Raju Ranjan Prasad और साहित्य (लेखन जगत ) में ऐसे लोगों की कितनी कमी है जो लोहे का स्वाद जानते हों !09 November at 18:43 · · 5 peopleLoading...
गाँधी का दर्शन जितना ही छोटा था आचरण उतना ही बड़ा . लोग उनके आचरण से झुकते थे , दर्शन से नहीं . गाँधी के इस रूप की दक्षिण -वाम सबको जरूरत है . मैं उस दिन की कल्पना करना चाहता हूँ जब हर आदमी गाँधी होगा या होने की कोशिश करेगा . मार्क्स का दर्शन और गाँधी का निजी आचरण -हमारा भविष्य इसी में बसता है .10 November at 09:16 · · 3 people
Saturday, November 13, 2010
सरकार ही क्यों वामपंथी पार्टियां तक सारा काम अंग्रेजी में करती हैं . यह सब सुविधा और सहूलियत के नाम पर चलाया जाता है .लेकिन सच्चाई यह है कि एक वर्ग -विभाजित समाज में भाषा भी अपनी सांस्कृतिक -सामाजिक हैसियत के आधार पर वर्गीकृत है .हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी एलीट है तो भोजपुरी -मगही के मुकाबले हिंदी. किसी मगही -भाषी के समक्ष आप अगर खड़ी बोली हिंदी बोलते हैं तो झट कह देगा -'अंग्रेजी' मत बोलिए .
सच तो यह है कि भाषाओँ में आपस में विरोध नहीं होता । हमारा यह मानना कि हिंदी के विकास से बोलियां कमजोर अथवा नष्टप्राय हो रही हैं ,वैज्ञानिक या तर्कसम्मत नहीं है.किसी भी भाषा का 'स्वतंत्र विकास' किसी भी दूसरी भाषा के नैसर्गिक विकास में बाधक नहीं है .यहाँ तक कि अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषाओँ से हिंदी समृद्ध हुई है . मुझे लगता है , हम भाषा पर बात करते विचार को अलग छोड़ देते हैं . अंग्रेजी ने विचार के स्तर पर हिंदी एवं अन्य भाषाओँ को जो योगदान दिया है उसे भुलाया नहीं जा सकता . सारी गडबड़ी भाषा के 'प्रायोजित विकास ' की है .
Friday, November 5, 2010
Raju Ranjan Prasad एक मित्र ने फेसबुक पर अपने बारे में टिप्पणी की 'नया मौलवी हूँ , इसलिए ज्यादा प्याज खा रहा हूँ '. बार -बार सोंचता हूँ -प्याज खाने की बात मौलवियों के साथ ही क्यों जोड़ी गयी ?
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