मैं तो अपने छात्रों को हिदायत देता हूं कि अगर वर्तनी दुरुस्त रखनी है तो कुछ भी नया पढ़ना बंद कर दो. हंस जैसी पत्रिकाओं में अशुद्धि की भरमार रहती है, साथ ही अभिनव ओझा की भूल-सुधार भी. दोनों काम साथ-साथ. यह केवल हंस का मामला नहीं है. वर्तनी की शुद्धता बहुत बड़ी चुनौती है हमारे सामने. बल्कि अब तो बोलने की हिम्मत भी नहीं होती. लोग 'शुद्धतावादी/शुचितावादी/ब्राह्मणवादी' आदि विभूषण दे डालते हैं.
Wednesday, February 9, 2011
Sunday, January 30, 2011
धर्मनिरपेक्षता और दंगा
भारतीय संविधान के अनुसार 'धर्मनिरपेक्षता' का मतलब 'सर्व धर्म समभाव' से है. भारत की सत्ता ऐसा 'समभाव' दिखाने में असमर्थ रही है. पुलिस प्रशासन से लेकर न्यायपालिका तक संदिग्ध भूमिका में हैं. विभूति नारायण राय , जो अन्य कारणों से फ़िलहाल काफी विवाद में रहे हैं, ने साप्रदायिक दंगे में पुलिस की भूमिका पर बड़ा ही महत्वपूर्ण काम किया है। उनका मानना है कि यहाँ की पुलिस हिंदू-पुलिस और मुस्लिम-पुलिस है। हिंदू -पुलिस चूँकि बहुसंख्या में है ,इसलिए 'स्वभावतः' मुस्लिम विरोधी है। सरकारी आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं. शायद इसीलिए मुस्लिम संगठनों की मांग है कि पुलिस में मुसलमानों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि एक तरह का संतुलन कायम किया जा सके.
विभूति जी ने तो यहाँ तक लिखा है कि दंगा शुरू तो हो सकता है लेकिन अगर वह चौबीस घंटे से ज्यादा टिकता है तो जानिए कि वह राज्य-समर्थित है. इसलिए कम-से-कम भारत का उदाहरण देखते हुए कहा ही जा सकता है कि राज्य का 'धर्मनिरपेक्ष' होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे 'असाम्प्रदायिक' होना भी है.
गंभीर मनोरंजन
गंभीर लोग हल्की -फुल्की चीज भी पढ़ें-लिखें तो उसे गंभीर मान लेने का खतरा बढ़ जाता है. उसे अगंभीर कहने का साहस लोग आसानी से नहीं बटोर पाते. इधर लगातार मेरे दिमाग में आता रहा कि नागार्जुन की 'मन्त्र ' कविता को 'कविता में मनोरंजन ' कहूँ तो कैसा रहे. लेकिन हिम्मत नहीं हो रही.
दांत का डॉक्टर
एकबार मैं भी दांत के डॉक्टर के पास गया था. दरअसल आधा दांत टूट चुका था और आधा बच रहा था. डॉक्टर ने सलाह दी कि मैं उसे 'टोपी' पहनवा दूँ. जैसे ही उसने कहा कि मैंने हामी भर दी. वह सहज ही भांप गया कि मैंने विषय की गंभीरता नहीं समझी. अतएव उसने तीन तरह के नमूने दिखाए-८०० सौ रुपये,१२०० सौ रुपये और २२०० रूपये के . सबसे अंत वाले की लाइफलॉन्ग गारंटी थी. अपनी जेब के हिसाब से मुझे यह सौदा पसंद नहीं था. अतएव मैंने कहा कि थोड़ा पुनर्विचार करता हूँ और 'बड़े-बड़े को टोप नहीं, कुत्ते को पजामा' कहते क्लीनिक से बाहर हो लिया.
Friday, January 14, 2011
हम जातिवादी नहीं
हम जातिवादी नहीं शुद्ध भौतिकवादी हैं . अगर हम जातिवादी होते तो हमारी जाति के अंदर की सारी समस्याएं कब की खत्म हो गई होतीं. हमारे लिए जातिवाद अवसरों को प्राप्त करने के लिए हथियार भर है. किन्तु जातिवादी आग्रहों/संस्कारों से हम मुक्त भी नहीं हैं. हमारा कायांतरण होना अभी बाकी है. शायद इसीलिए अंतर्जातीय विवाह के बाद भी जाति बनी रहती है . 'अंतर्जातीय' शब्द ही बताता है कि जाति का अस्तित्त्व कायम है.
पुनर्जन्म और कबीर
गुरु को मानुष जो गिनै, चरणामृत को पान।
ते नर नरिके जाहिगें, जन्म जन्म होय स्वान।।
गुरु की आज्ञा आवई, गुरु की आज्ञा जाय।
कहै कबीर सो संत है, आवागमन नसाय।।
झूठे गुरु के पक्ष को, तजत न कीजै बार।
पार न पावै शब्द का भरमें बारंबार।।
सांचे गुरु के पक्ष में, मन को दे ठहराय।
चंचलते निश्चल भया, नहिं आवै नहीं जाय।।
सूर समाणौं चंद में, दहूँ किया घर एक।
मन का च्यंता तब भया, कछू पूरबला लेख।।
देखौ कर्म कबीर का, कछु पुरब जनम का लेख।
जाका महल न मुनि लहैं, (सो) दोसत किया अलेख।।
'स्त्रियों के प्रति कबीर
काँमणि काली नागणीं तीन्यूँ लोक मझारि।
राम सनेही ऊबरे, विषई खाये झाबरि।।
कामणि मीनीं षाँणि की, जे छेड़ौं तौ खाइ।
जे हरि चरणाँ राचियाँ, तिनके निकट न जाइ।।
नारी सेती नेह, बुधि विवके सबही हरै।
काँइ गमावै देह, कारिज कोइ, नाँ सरै।।
नारी नसावैं तीनि सुख, जा नर पासैं होई।
भगति मुकति निज ग्यान मैं, पैसि न सकई कोइ।।
एक कनक अरु काँमनी, विष फल कीएउ पाइ।
देखै ही थै विष चढ़ै, खाँयै सूँ मरि जाइ।।
एक कनक अरु काँमनी, दोऊ अगनि की झाल।
देखें ही तन प्रजलै, परस्याँ ह्वै पैमाल।।
जोरू जूठणि जगत की, भले बुरे का बीच।
उत्तम ते अलगे रहैं, निकटि रहै तें नीच।।
नारी कुंड नरक का, बिरला थंभै बाग।
कोई साधू जन ऊबरै, सब जन मूँवा लाग।।
सुंदरि थै सूली भली, बिरला बंचै कोय।
लोह निकाला अगनि मैं, जलि बलि कोइला होय।।
भगति बिगाड़ी काँमियाँ, इंद्री केरै स्वादि।
हीरा खोया हाथ थैं, जनम गँवाया बादि।।See more
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