अरे भाई डॉक्टरों की मत पूछिए. कोई दसेक साल पहले मैं अपने बड़े भाई (अखिलेश कुमार ) के साथ उन्हीं के इलाज के सिलसिले में जेनरल फिजिसियन एवं हर्ट स्पेशलिस्ट महेंद्र नारायण ( अब दिवंगत ) के यहाँ गया था. रात्रि के बारह बज चुके थे और मरीजों का अब ...भी ताँता लगा हुआ था. हम दोनों ही इंतजार कर थक चुके थे लेकिन नंबर आने का नाम नहीं ले रहा था. कहा जाता है न कि 'खाली दिमाग शैतान का घर'-सो मेरे बड़े भाई ने एक नुस्खा अजमाया. उन्होंने मुझसे पूछा , 'राजू जरा बताओ कि यह डॉक्टर कब तक मरीजों को यूँ ही देखता रहेगा ?' मैंने अपने पूर्व संचित ज्ञान के आधार पर जबाव दिया-'जबतक भोर समझकर चिडियाँ बोलना न शुरू कर दे.' उन्होंने फिर सवाल किया, 'तो फिर डॉक्टर साहब सोते कब हैं ?' डॉक्टर साहब की दिनचर्या का मुझे कुछ-कुछ अंदाजा था, इसलिए मैंने चट कहा, 'सोने का तो नाम ही मत लीजिए. यहाँ से उठेंगे तो सीधे पी.एम.सी.एच.के लिए दौड़ेंगे. फिर वहां से दौड़ते हुए दोपहर में अपने क्लीनिक घुसेंगे. और 'रात्रि -लीला' तो आप लाइव देख ही रहे हैं.' बड़े भाई अब चिंतित हो उठे . बोले , 'डॉक्टर साहब , लगता है, कई रातों से सो नहीं सके हैं , इसलिए इनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं होगी . ऐसा करते हैं कि पहले इनका इलाज किसी मानसिक चिकित्सक से करवाते हैं . अगर स्वस्थ हो गये तो फिर इनसे अपना इलाज कराना ठीक रहेगा.' मैंने कहा , 'आप बिल्कुल दुरुस्त फरमा रहे हैं .' महेंद्र नारायण का कम्पौंडर यह सब पहले ही से सुन रहा था और आग बबूला हो रहा था . डॉक्टर को पागल कह देनेवाली बात उसे असह्य लगी. वह दौड़ा हुआ अंदर गया और कह आया, 'सर , बाहर दो ऐसा पागल पंहुचा हुआ है जो आपही को पागल कहता है और सारे मरीज उसकी बातों में दिलचस्पी ले रहे हैं.' डॉक्टर ने तत्काल उसे हमदोनो को अंदर भेजने का आदेश दिया. अब हमलोग अंदर थे . महेंद्र नारायण मुस्कुराहट भरी एक टिप्पणी के साथ कि 'पागल के पास आपलोग क्यों आ गये ' प्रेस्क्रिप्शन पर दवाइयों का नाम लिखने में व्यस्त हो गये. बाहर हम दोनों काफी खुश थे कि चलिए पागल से जल्द ही मुक्ति मिल गई.
Tuesday, March 22, 2011
Wednesday, February 9, 2011
मैं तो अपने छात्रों को हिदायत देता हूं कि अगर वर्तनी दुरुस्त रखनी है तो कुछ भी नया पढ़ना बंद कर दो. हंस जैसी पत्रिकाओं में अशुद्धि की भरमार रहती है, साथ ही अभिनव ओझा की भूल-सुधार भी. दोनों काम साथ-साथ. यह केवल हंस का मामला नहीं है. वर्तनी की शुद्धता बहुत बड़ी चुनौती है हमारे सामने. बल्कि अब तो बोलने की हिम्मत भी नहीं होती. लोग 'शुद्धतावादी/शुचितावादी/ब्राह्मणवादी' आदि विभूषण दे डालते हैं.
Sunday, January 30, 2011
धर्मनिरपेक्षता और दंगा
भारतीय संविधान के अनुसार 'धर्मनिरपेक्षता' का मतलब 'सर्व धर्म समभाव' से है. भारत की सत्ता ऐसा 'समभाव' दिखाने में असमर्थ रही है. पुलिस प्रशासन से लेकर न्यायपालिका तक संदिग्ध भूमिका में हैं. विभूति नारायण राय , जो अन्य कारणों से फ़िलहाल काफी विवाद में रहे हैं, ने साप्रदायिक दंगे में पुलिस की भूमिका पर बड़ा ही महत्वपूर्ण काम किया है। उनका मानना है कि यहाँ की पुलिस हिंदू-पुलिस और मुस्लिम-पुलिस है। हिंदू -पुलिस चूँकि बहुसंख्या में है ,इसलिए 'स्वभावतः' मुस्लिम विरोधी है। सरकारी आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं. शायद इसीलिए मुस्लिम संगठनों की मांग है कि पुलिस में मुसलमानों की संख्या बढ़ाई जाए ताकि एक तरह का संतुलन कायम किया जा सके.
विभूति जी ने तो यहाँ तक लिखा है कि दंगा शुरू तो हो सकता है लेकिन अगर वह चौबीस घंटे से ज्यादा टिकता है तो जानिए कि वह राज्य-समर्थित है. इसलिए कम-से-कम भारत का उदाहरण देखते हुए कहा ही जा सकता है कि राज्य का 'धर्मनिरपेक्ष' होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसे 'असाम्प्रदायिक' होना भी है.
गंभीर मनोरंजन
गंभीर लोग हल्की -फुल्की चीज भी पढ़ें-लिखें तो उसे गंभीर मान लेने का खतरा बढ़ जाता है. उसे अगंभीर कहने का साहस लोग आसानी से नहीं बटोर पाते. इधर लगातार मेरे दिमाग में आता रहा कि नागार्जुन की 'मन्त्र ' कविता को 'कविता में मनोरंजन ' कहूँ तो कैसा रहे. लेकिन हिम्मत नहीं हो रही.
दांत का डॉक्टर
एकबार मैं भी दांत के डॉक्टर के पास गया था. दरअसल आधा दांत टूट चुका था और आधा बच रहा था. डॉक्टर ने सलाह दी कि मैं उसे 'टोपी' पहनवा दूँ. जैसे ही उसने कहा कि मैंने हामी भर दी. वह सहज ही भांप गया कि मैंने विषय की गंभीरता नहीं समझी. अतएव उसने तीन तरह के नमूने दिखाए-८०० सौ रुपये,१२०० सौ रुपये और २२०० रूपये के . सबसे अंत वाले की लाइफलॉन्ग गारंटी थी. अपनी जेब के हिसाब से मुझे यह सौदा पसंद नहीं था. अतएव मैंने कहा कि थोड़ा पुनर्विचार करता हूँ और 'बड़े-बड़े को टोप नहीं, कुत्ते को पजामा' कहते क्लीनिक से बाहर हो लिया.
Friday, January 14, 2011
हम जातिवादी नहीं
हम जातिवादी नहीं शुद्ध भौतिकवादी हैं . अगर हम जातिवादी होते तो हमारी जाति के अंदर की सारी समस्याएं कब की खत्म हो गई होतीं. हमारे लिए जातिवाद अवसरों को प्राप्त करने के लिए हथियार भर है. किन्तु जातिवादी आग्रहों/संस्कारों से हम मुक्त भी नहीं हैं. हमारा कायांतरण होना अभी बाकी है. शायद इसीलिए अंतर्जातीय विवाह के बाद भी जाति बनी रहती है . 'अंतर्जातीय' शब्द ही बताता है कि जाति का अस्तित्त्व कायम है.
पुनर्जन्म और कबीर
गुरु को मानुष जो गिनै, चरणामृत को पान।
ते नर नरिके जाहिगें, जन्म जन्म होय स्वान।।
गुरु की आज्ञा आवई, गुरु की आज्ञा जाय।
कहै कबीर सो संत है, आवागमन नसाय।।
झूठे गुरु के पक्ष को, तजत न कीजै बार।
पार न पावै शब्द का भरमें बारंबार।।
सांचे गुरु के पक्ष में, मन को दे ठहराय।
चंचलते निश्चल भया, नहिं आवै नहीं जाय।।
सूर समाणौं चंद में, दहूँ किया घर एक।
मन का च्यंता तब भया, कछू पूरबला लेख।।
देखौ कर्म कबीर का, कछु पुरब जनम का लेख।
जाका महल न मुनि लहैं, (सो) दोसत किया अलेख।।
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